1. सारी भाषायें समान रूप से महत्त्वपूर्ण व आवश्यक है। भाषायें इंसानियत की सामूहिक व विशिष्ट रूप से पाई जाने वाली भाषाई क्षमता का प्राकृतिक परिणाम है जो सृष्टि में उपस्थित एक अनोखी संपर्क व्यवस्था है।
इस क्षमता के भाव के रूप में सारे इंसानी समूहों ने अपनी स्वयं की भाषायें विकसित की हैं। अपनी समृद्धता व विविधता के बीच सारी भाषायें में कुछ सर्वनिष्ठ तत्व पाये जाते हैं (सार्वभौमिक भाषाई तत्व), और सारी भाषायें सीखी जा सकती हैं।
इस सार्वभौमिक विरासत, यानि भाषाई क्षमता का बहुल भाव भाषाई विविधता है जो जनसमूहों को इकट्ठा करता है और सभी को समान रूप से इंसानियत को योगदान देने की संभावना देता है।
2. इंसानियता की प्राकृतिक अवस्था भाषाई विविधता है और यह उसकी समृद्धता का एक बुनियादी भाव है। विविधीकरण एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, इंसानी प्रजाति की परिस्थितियों और परिवेश में एक अन्तर्जात तथ्य है, जैसे सांस्कृतिक विविधता और जैव-विविधता भी हैं। समय के साथ-साथ इंसानियत भाषाई विविधता पर आधारित होकर निर्मित हुई है।
3. भाषायें समाज बनाते हैं और वे एक संस्कृति के सबसे अधिक उभरे हुये आविर्भावों में से एक हैं। भाषायें उन विशिष्टतायों के समूह का अंग हैं जो एक समुदाय को परिभाषित करते हैं। इसके अलावा भाषायें सारी सांस्कृतिक उपलब्धियों को भावित करती हैं, उन्हें प्रकट करती हैं और अधिक ठोस बनाती हैं। हर भाषा संसार का एक मूर्त अवलोकन प्रकट करती है, जो एक विशिष्ट और जटिल कल्पित वस्तु होता है और जिससे हम हमारे आस-पास की सारी चीज़ों को क्रमानुसार व्यवस्थित, वर्गीकृत कर सकते हैं और नामकरण दे सकते हैं। यह अमूर्त संकल्पनायों व विचारों से लेकर मूर्त अनुप्रयोगों के द्वारा किया जा सकता है, और इनके द्वारा सूचना व जानकारी संप्रेषित की जा सकती है।
4. भाषा सामूहिक स्मृति का अन्तर्जात भाग है और उसके भविष्य निर्माण का एक औज़ार है। स्मृति और शब्द के द्वारा मनुष्य इतिहास, परंपरा, मिथक व पौराणिक कथायें याद रखता है; प्रवीणतायें, तकनीक का संप्रेषण कर सकता है और साथ ही साथ भविष्य निर्माण के औज़ार की तरह जनसमूहों के स्वप्नों, परियोजनायों व इच्छायों को प्रकट व उनका समाजीकरण कर सकता है। एक भाषा वह बुनियादी आधार है जिससे एक संस्कृति का वर्णन हो पाता है और यह उसकी स्मृति का एक अत्यावश्यक भंडार है।
5. भाषायें इंसानी समूहों के सह-अस्तित्व, पहचान और सम्बद्धता के लिये बुनियादी हैं। हर भाषा वह सह-अस्तित्व क्षेत्र है जो सामाजिक जीवन के लिये एक सामूहिक और सुखद क्षेत्र रचता है। भाषायें निजी या फ़िर सामूहिक रूप से मार्मिक अनुभव को जीने व बाँटने का कार्य करती हैं। ये भिन्न संस्कृतियों से आने वाले नये लोगों का समाकलन करवाती हैं और नये कल्पित विषयों का संयुक्त निर्माण भी। इसके अलावा एक भाषा एक जनसमूह की पहचान प्रकट करती है, उसके बोलने वालों का प्रतीक बनती है, जो उन्हें जोड़ने वाला मूल तत्व है और उन्हें एक निश्चित समुदाय का सदस्य बनाता है। भाषा हमें संसार में एक जगह दिलवाती है, और पूर्वजों के साथ हमारे संबंध उजागर करती है।
6. भाषायें बोली जायें तो जीवित रहती हैं, ये गतिशील होती हैं और सामाजिक सच्चाई व समुदायों की नई ज़रूरतों के अनुकूल हो जाती हैं। मूल तौर से भाषायें गतिविधियाँ हैं। किसी भाषा के बने रहने का सबसे बेहतर तरीका है उसे जीवन के हर परिवेश में इस्तेमाल करना और उसे अगली पीढ़ियों को संप्रेषित करना। आधुनिकता की चुनौतियों के सामने सारी भाषायें बदलने व नयी सामाजिक आवश्यकतायों के अनुकूल होने के लिये तैयार हैं, चाहे यह नवीनतायों, नये शब्दों का प्रयोग या निर्माण से हो और अन्य भाषायों से संपर्क से होने वाली समृद्धता से भी। सारी भाषायें खुली, गतिशील और अपूर्ण होती हैं।
7. विविधता और भिन्नता को स्वीकारने से संस्कृतियों के बीच वास्तविक संवाद का एक द्वार खुलता है। सामूहिक भविष्य पर संवाद किसी भी भाषा व किसी भी संस्कृति के स्थान से किया जा सकता है। इंसानियत का विकास संस्कृतियों के बीच संपर्क क्षमता से सीधे रूप से संबंधित है।
अन्य सामाजिक व सांस्कृतिक तत्वों की तरह भाषा संपर्क व सहचर्य का एक क्षेत्र बनाती है। इस तरह से यह एक सेतु बनती है और अंतर-सांस्कृतिक संवाद की ओर प्रेरित करती है, जिसकी वजह से शांति की एक वास्तविक संस्कृति बनाना व समझ और सहयोग पर आधारित अंतर-राष्ट्रीय सह-अस्तित्व की कुछ स्थितियों का निर्धारण संभव हो पाता है।
8. वैश्वीकरण का भाषाई विविधता के एक अवसर के रूप में फायदा उठाना ज़रूरी है। वैश्वीकरण की प्रक्रियायों पर एक नयी नज़र डालना और उन्हें एक अवसर के रूप में इस्तेमाल करना ज़रूरी है ताकि ग्रह के सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक परिवेशों के सार्वजनिक व निजी दोनों मंडलों में भिन्न-भिन्न भाषायों की उपस्थिति सामान्यकृत हो पाये। अर्थ-व्यवस्था और तकनीक भाषाई विविधता को समानता से मज़बूत बनाने के बहुत महत्त्वपूर्ण औज़ार हो सकते हैं।
9. एक भाषा का लुप्त होना इंसानियत की समृद्धि के एक भाग की क्षति होना है। कोई भी भाषा प्राकृतिक कारणों से लुप्त नहीं होती।
एक भाषा के लुप्त होने की प्रक्रिया में पीढ़ियों के सांस्कृतिक समाकलन और समुदाय के सामाजिक संबद्धता से संबंधित महत्त्वपूर्ण दरारें पैदा होती हैं। एक भाषा का विस्थापन और जनजाति-हत्या केवल एक बुनियादी संपर्क तत्व की हानि नहीं है बल्कि समय के साथ-साथ निर्मित की गई एक ज्ञान व्यवस्था का नाश है। सारी भाषायों को सुरक्षित रहने का अधिकार है क्योंकि एक भाषा का विनाश एक विशेष परिवेश और एक विशेष परिस्थिति से जुड़े एक अनोखे व कभी भी न दोहराये जाने वाले ब्रह्मांड का विनाश होता है। किसी जनसमूह की भाषा की बात करना उसके मनुष्य बने रहने के तरीके के सबसे महत्त्वपूर्ण व सबसे प्राकृतिक रूप की बात करना है। किसी भाषा के विनाश से सभी को हानि पहुँचती है।
10. इंसानियत के लिये भाषाई विविधता को बचाये रखना और उसके भविष्य की ज़िम्मेदारी लेना बहुत बड़ी चुनौती है। हरेक भाषा और भाषाई विविधता के जीवित रहने की ज़िम्मेदारी लेना इंसानियत का एक सामूहिक ध्येय होना चाहिये।
सारे व्यक्ति और संस्थायें, जैसे स्थानीय तंत्र, सरकारें, देश व अंतर-राष्ट्रीय संस्थायों को भाषाई विविधता व भाषायों के सह-अस्तित्व के प्रति सहयोग करने व ज़िम्मेदारियाँ लेनी चाहियें। समझ व सहयोग के द्वारा ग्रह की भाषाई विरासत को सम्मान देना, प्रबल करना व सुरक्षित करना अत्यावश्यक है।