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भूमध्य की भाषाएँ

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भूमध्य की भाषाएँ

जब हम भूमध्य की भाषायों की बात करते हैं तब Linguamón – भाषा भवन ने इस जानकारी-आधार पर जो कार्य किया है उसकी बात करना ज़रूरी है। 

इस भाग में जो भाषाएँ हैं वे दो बड़े समूहों में विभाजित हैं: 

• क्षेत्रीय भाषाएँ जो भूमध्यसागर के इलाकों में पाई जाती हैं  
• वे भाषाएँ जो भिन्न ऐतिहासिक कारणों से अब भूमध्य क्षेत्र में बोली जाती हैं।     

इन मापदण्डों के अनुसार गालिसियाई या ब्रेतोनी भाषाएँ भूमध्य की भाषाएँ नहीं हैं क्योंकि इनके भाषाई इलाके सागर तट के साथ-साथ नहीं हैं, जबाकि ये दो भूमध्य देशों में बोली जाती हैं, फ्रांस व स्पेन।

दूसरी तरफ अंग्रेज़ी जैसी भाषाएँ हमारे जानकारी-आधार में हैं क्योंकि विभिन्न ऐतिहासिक कारणों से वह माल्टा व जिबराल्टार द्वीपों पर आधिकारिक भाषा है। 

क्षेत्रीय मापदण्ड के अनुसार भूमध्य में तीन भाषाई परिवार संयोग करते है:  

1. भारतीय-यूरोपीय, रोमन भाषायों, दक्षिण स्लाव, यूनानी व अल्बानी   द्वारा बना हुआ।  
2. अफ्रीकी-एशियाई, सामी भाषायों (मुख्य तौर पर यहूदी व अरबी) व अमज़िक या बेरबेर (उनकी अलग-अलग विभिन्नतायों के साथ) द्वारा बना हुआ। 
3. आल्ताइक, जिसमें तुर्की सबसे ख़ास भाषा है।   

भूमध्य का भाषाई इतिहास बहुत ही ज़्यादा विविध रहा है, चूंकि एक तरफ तो यहाँ दो काफी महत्त्वपूर्ण भाषाई विस्तार हुए हैं - लातिनी व अरबी के - व दूसरी तरफ यह विभिन्न भाषाई समुदायों के सहास्तित्व का प्रतिमान है।

जैसे विश्व के दूसरे सागरों में भी, भूमध्य के समुद्री रास्तों ने अलग-अलग समुदायों के बीच संबंध बनाने के कार्य को फलीभूत किया है। इन आदान-प्रदान के उदाहरणों ने विश्व के काफी हिस्सों में अपनी छाप छोड़ी है। 

उदाहरण के लिए: यूनानी में बहुत से ऐसे शब्द हैं जैसे कैटालोग, हीरा, कागज़ या ट्रैजडी, जो दूसरी ऐसी भाषायों द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं जिनका भूमध्य से कोई नाता नहीं है। यूनानी के द्वारा मिस्री संस्कृति ने दुनिया में कागज़  या पिरामिड जैसे शब्द भी दिए हैं। काफी जानवरों के नाम, जो अब संसार की अधिकतर भाषायों के शब्दकोशों में पाए जाते हैं, यूनानी से ही निकले हैं: व्हेल, ऊँट, मगरमच्छ, द्रोमेदारी, ऑस्ट्रिच, दरियाई घोड़ा, तेंदुआ, गैंडा, कछुआ वगैरह व आम बोल-चाल की भाषा के कुछ शब्द भी (रस्सी, टुकड़ा, दराज़  या सैंडल)। यूनानी अब तक नए शब्द बनाने में काम भी आती है, नववाद बनाने में, व उन शब्दों को बनाने में जो यूनानी या लातिनी के बल पर बनाए जाते हैं, जिन्हें सभ्यवाद कहा जाता है (टेलीफोन, हाइपोकोन्ड्रिया, मेटाफिसिक्स, हेटेरोजनस, वगैरह)।

यूनानी का नववाद व सभ्यवाद बनाने का कार्य एक और भूमध्य भाषा भी करती है, लातिनी; जो सदियों से रोमानी भाषायों में अधिक विविध होती रही है, व ये रोमानी भाषाएँ सारे महाद्वीपों के देशों की आधिकारिक भाषाएँ के रूप में फैलती रही हैं। बाद में अंग्रेज़ी भी इन भाषायों में जुड़ी व इनके द्वारा विश्व की भाषायों में इस प्रकार के शब्द आए हैं ऑडिटोरियम, स्पांसर, फतांसी, फोरम, इनडेक्स  और पेज, व और भी बहुत से। 

अरबी से भी संसार की बहुत सी भाषायों में शब्द आए हैं, आदान-प्रदान के भूमध्य क्षेत्र के द्वारा। शब्द जैसे ज़ीरो, सिफर, अंकगणित या बीजगणित, व कुछ आम बोल-चाल की भाषा के भी जैसे कपास, बैंगन या गोदाम बहुत सी भाषायों में आज की तारीख़ में सुने जा सकते हैं। 

शब्दों के अलावा भूमध्य समुदायों के बीच भाषाई आदान-प्रदान का एक और साधन रहा मल्लाहों, यूरोपीय व्यापारियों, तुर्कों व अरबियों के बीच धर्मयुद्धों से बीसवीं शताब्दी की शुरुआत तक इस सागर के बंदरगाहों में बोली जाने वाली जनभाषा। भूमध्य जनभाषा का आधार मूलभूत तौर पर रोमन ही है पर उसमें अरबी, तुर्की व यूनानी तत्त्व भी हैं। 

आज जनभाषा शब्द किसी भी उस भाषा के लिए प्रयुक्त किया जाता है जो दो या अधिक उन समूहों या व्यक्तियों के बीच संप्रेषण का काम देती है जिनकी एक भाषा नहीं है। इस तरह आरामेउ जनभाषा का एक स्पष्ट उदाहरण है जो प्राचीनकाल में निकट पूर्व में व भूमध्य के पूर्वी तट के साथ-साथ बोली जाती थी, व सातवीं सदी में यह काम आरामेउ की जगह अरबी करने लगी। 

अंग्रेज़ी (जो आज की तारीख़ में दुनिया की जनभाषा बन चुकी है) के मुकाबले में जनभाषा के कुछ अ-यूरोपीय शास्त्रीय उदाहरणों में नाहुआत्ल, स्वाहिली व काते भाषाएँ हैं जिनके विस्तार ने बहुत सी दूसरी स्थानिक भाषायों के विस्थापन को बढ़ावा दिया है। 

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